सचित्र भारतीय साहित्य एक नवोन्मेषी साहित्यिक परियोजना है, जिसके अंतर्गत सात भारतीय भाषाओं के विख्यात उपन्यासों को सरल एवं सचित्र रूप में प्रकाशित किया जा रहा है । इसका उद्देश्य, भारतीय साहित्य की विख्यात रचनाओं और उनके लेखकों से पाठकों को परिचित कराना है। सचित्र भारतीय साहित्य की प्रत्येक पुस्तक में छह प्रसिद्ध उपन्यास होंगे, जिनमें से प्रत्येक उपन्यास के कथानक का संक्षेप सिर्फ 32 पृष्ठों में रंगबिरंगे चित्रों के साथ पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार पढ़ने की प्रक्रिया सरल बन जाती है और कुछ ही मिनटों में पूरी कहानी को पढ़ा और समझा जा सकता है। भारतीय साहित्य के प्रति पाठकों को उन्मुख कराना सचित्र भारतीय साहित्य का मूलमंत्र है, जिसके ज़रिए भारतीय लेखकों और उनकी विख्यात रचनाओं की ओर पाठकों को आकर्षित कराना हमारा लक्ष्य है। यह भी गौरव की बात है कि सचित्र भारतीय साहित्य, सचित्र रूप में भारतीय साहित्य को अपनाने और विश्व भर में फैलाने की दिशा में पहला और एकमात्र प्रयास है। सचित्र भारतीय साहित्य भारत की समृद्ध साहित्यिक विरासत को समर्पित है।
प्रस्तुत चित्रकथा, लेखिका अमृता प्रीतम के इसी नाम के प्रसिद्द उपन्यास पर आधारित है।
उपन्यास का परिचय
गुजरात जिले के छत्तो आनी गाँव के शाहों की बेटी पूरो सुन्दर सयानी लडकी है। उसकी सगाई रत्तोवाल गाँव के एक अच्छे घराने के रामचंद्र के साथ हो जाती है। पूरो शादी की सुन्दर कल्पनाओं में खोयी, खेत से लौट रही थी कि उसी गाँव के शेखों का बेटा रशीद शाहों के साथ अपने दादा-परदादाओं के बैर को पूरा करने हेतु उसका अपहरण कर घोड़े पर बिठाकर ले जाता है, और दूर अपने बाग के कमरे में बंद करके रख लेता है। पंद्रह दिन बाद जब पूरी उसके बंधन से बच निकलकर अपने दरवाज़े पर आ जाती है तब उसकी माँ-बाप उसे स्वीकार नहीं करते। अपने जीवन का अंत करने का निश्चय करके लौटते वक्त रास्ते में रशीद मिल जाता है जो पूरो का हाथ पकड़कर अपने घर ले चलता है, और फिर पूरो की इच्छा के विरुद्ध उससे निकाह कर लेता है। रशीद मुसलमान होते हुए भी पूरो से सच्चे दिल से प्यार करता है, लेकिन पूरो का मन उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। एक साल बाद जब पूरो रशीद के बच्चे को जन्म देती है, तब उसे अपने स्तन का दूध पिलाने के लिए तुरंत तैयार नहीं होती। आखिर अपनी कोख का फर्ज़ अदा करके दूध पिलाती है। समय के चलते पूरी एक अनाथ बालिका कम्मो और असहाय एवं बीमार महिला तारो की जीवन की ताकत बन जाती है, और एक पागल स्त्री के गर्भ से जन्मे एक बालक को अपना दूध पिलाकर पालन पोषण करती है। इस बीच रशीद पूरो का दिल जीत लेता है। काफी समय बीतने पर भी पूरो के मन में अपने मंगेतर रामचंद्र और उसके घर व खेत को देखने की इच्छा जगी रहती है। रहीम की माँ के इलाज के बहाने रत्तोवाल गाँव जाकर रामचंद्र के खेत को दूर से देखकर लौट आती है। 1947 के बाद हए हिन्दु-मुस्लिम दगों में जब सारे हिन्दु अपने गाँव छोड़कर चले जाते हैं तब काफिले में शामिल रामचंद्र को पहचान कर बातचीत करती है और रामचंद्र की बहन और अपनी भाभी लाजो का पता लगाकर मुसलमानों के घर से उसे मुक्त कराती है।
लेखिका का परिचय
अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को पंजाब के गुजराँवाला जिले में हुआ। उनको पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है। उन्होंने कुल मिलाकर 100 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें उनकी चर्चित आत्मकथा रसीदी टिकट भी शामिल है। अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में है, जिनकी रचनाओं का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। अमृता प्रीतम जी की प्रमुख रचनाएँ हैं, उपन्यास:- पाँच बरस, लंबी सड़क, पिंजर, अदालत, कोरे कागज, उन्चास दिन, सागर और सीपियाँ, आत्मकथा रसीदी टिकट, |कहानी संग्रह:- कहानियाँ जो कहानियाँ नहीं हैं, कहानियों के आँगन में। संस्मरण:- कच्चा आँगन, एक थी सारा. कविता संग्रह: - लोक पीड़, मैं जमा तू, लामियाँ वतन, कस्तूरी, सुनहुडे (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह) तथा कागज़ ते कैनवास ( ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कविता संग्रह) सहित 18 कविता संग्रह | गद्य कृतियाँ :- किरमिची लकीरें, काला गुलाब, अग दियाँ लकीराँ, इकी पत्तियाँ दा गुलाब, सफरनामा, औरत: इक दृष्टिकोण, इक उदास किताब आदि। अमृता प्रीतम जी को 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग का पुरस्कार, 1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार ( अन्तर्राष्ट्रीय) और 1982 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया । उन्हें भारत का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्मविभूषण भी प्राप्त हुआ।
अमृता प्रीतम जी की मृत्यु 31 अक्तूबर 2005 को नई दिल्ली में हुई ।

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