श्री राम जन्मभूमि भाग-1
बात है साल 1983 की। एक छोटा सा बच्चा था, जिसका नाम था अमित। अमित अपने दादा-दादी के साथ पावन नगरी अयोध्या घूमने गया था। अयोध्या पहुँचकर जब अमित ने श्री रामजन्मभूमि के दर्शन किए, तो उसकी आँखें हैरान रह गईं। उसने देखा कि भगवान श्री राम की प्रतिमा एक छोटी सी कोठरी में सलाखों के पीछे बंद है—बिलकुल किसी जेल की तरह! अमित ने तपाक से अपने दादा जी का हाथ पकड़ा और पूछा— "दादा जी! हमारे देश तो आजाद है, फिर हमारे प्यारे राम जी को इस तरह जेल में क्यों बंद कर रखा है?" दादा जी ने प्यार से अमित के सिर पर हाथ फेरा और कहा,- "बेटा, इसके पीछे बहुत लंबा इतिहास है। आओ, इन सीढ़ियों पर बैठो, मैं तुम्हें शुरुआत से पूरी कहानी सुनाता हूँ..."
दादा जी ने बताना शुरू किया— "बेटा अमित, त्रेता युग में जब भगवान श्री राम अपने बैकुंठ धाम प्रस्थान कर गए, तब उनके बड़े पुत्र महाराज कुश ने अपने पिता की याद में जन्मस्थान पर सुंदर पत्थर के खंभों वाला एक भव्य मंदिर बनवाया। इसके बाद सूर्यवंश की 44 पीढ़ियों ने अयोध्या पर राज किया। द्वापर युग आया, और राजा ब्रहद्धल अयोध्या के नरेश बने। जब महाभारत का भीषण युद्ध छिड़ा, तो राजा ब्रहद्धल कौरवों की ओर से लड़ने कुरुक्षेत्र गए और वीरगति को प्राप्त हुए। समय बीतता गया, मंदिर तो वहीं रहा, लेकिन धीरे-धीरे प्राचीन अयोध्या नगरी उजड़ने लगी..."
"फिर आया कलयुग! उज्जैन के महान और न्यायप्रिय राजा विक्रमादित्य के मन में अपने आराध्य प्रभु राम की जन्मभूमि का जीर्णोद्धार करने की इच्छा जगी। मार्ग जानने के लिए वे तीर्थराज प्रयाग पहुँचे और त्रिवेणी संगम में स्नान कर एक प्राचीन वटवृक्ष के नीचे ध्यान लगाने बैठ गए। ध्यान पूरा होने पर उन्हें एक दिव्य ऋषि मिले। ऋषि ने राजा विक्रमादित्य को एक नव-प्रसूता गाय दी और कहा— ऋषि: "राजन! इस गाय को अयोध्या ले जाओ। जहाँ यह गाय गोबर करे, वह मणिपर्वत होगा। वहाँ से 500 धनुष नापकर गाय को घुमाना। जहाँ इसके स्तनों से अपने आप दूध की धारा बहने लगे, समझ जाना वही प्रभु श्री राम का वास्तविक जन्मस्थान है!" राजा विक्रमादित्य ने अयोध्या पहुँचकर ठीक वैसा ही किया। और चमत्कार! एक स्थान पर पहुँचते ही गाय के स्तनों से दूध बहने लगा। राजा विक्रमादित्य ने अति प्रसन्न होकर वहाँ एक विशाल भव्य मंदिर का निर्माण कराया और पूरी अयोध्या नगरी का कायाकल्प कर दिया!"
"सदियाँ बीतती गईं। कन्नौज के राजा विजयचंद और उनके पुत्र जयचंद ने भी मंदिर की देखभाल की। सन 1510 में सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानकदेव जी ने भी यहाँ आकर रामलला के दर्शन किए थे। लेकिन बच्चों, सन 1527-28 में मुगल शासक बाबर का सेनापति मीरबाकी अपनी सेना लेकर अयोध्या आया। उसने क्रूरता दिखाते हुए तोपों से उस पावन मंदिर को ढहा दिया। उस समय मंदिर के सिद्ध संत श्यामानंद जी ने भगवान की मुख्य प्रतिमा को सुरक्षित करने के लिए सरयू नदी के किनारे छिपा दिया और स्वयं हिमालय चले गए। मंदिर को बचाने के लिए सैकड़ों रामभक्तों और पुजारियों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। बाद में, अकबर के समय में बीरबल और टोडरमल की सलाह पर परिसर के चबूतरे पर खस की टाट से एक छोटा सा मंदिर बनाया गया, जहाँ पूजा-अर्चना चलती रही। पर औरंगजेब के समय में एक बार फिर सनातन प्रतीकों को नुकसान पहुँचाया गया।"
"समय बदला और भारत पर अंग्रेजों का राज हो गया। 1859 में अंग्रेजों ने विवाद से बचने के लिए परिसर में लोहे की बाड़ (घेरा) लगा दी। 19 जनवरी 1885 को महंत रघुवीर दास जी ने फैजाबाद अदालत में पहली बार रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाने की कानूनी याचिका दायर की। फिर आया 23 दिसंबर 1949 का ऐतिहासिक दिन! रात के समय विवादित परिसर में बाबरी ढांचे के भीतर प्रभु रामलला की दिव्य मूर्तियां प्रकट हो गईं। तनाव बढ़ता देख सरकार ने उस स्थान को विवादित घोषित कर दिया और मुख्य द्वार पर बड़ा सा ताला लगा दिया। इस तरह, आजादी के बाद भी प्रभु राम अपनी ही नगरी में सलाखों और ताले के पीछे बंद हो गए..."
"रामलला को ताले से मुक्त कराने के लिए संतों और विश्व हिंदू परिषद ने एक बड़ा आंदोलन शुरू किया। राम-जानकी रथ यात्रा (1984): माता सीता की जन्मस्थली सीतामढ़ी से देश भर में रथ यात्रा निकाली गई, जिसे देखकर लाखों लोगों के दिल में रामलला के दर्शन की आस जगी। 21 जनवरी 1986 को फैजाबाद कोर्ट में वकील उमेश पांडे ने याचिका लगाई। 1 फरवरी 1986 को जिला जज के.एम. पांडे ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 1 घंटे के भीतर ताला खोलने का आदेश दे दिया! जैसे ही ताला खुला, पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ गई! दूरदर्शन पर समाचार आते ही घर-घर में पटाखे फोड़े गए और दीवाली मनाई गई! अमित भी टीवी देखकर खुशी से झूम उठा—अमित: "दादा जी! ताला खुल गया! हमारे रामलला मुक्त हो गए!" "ताला तो खुल गया, लेकिन भव्य मंदिर का निर्माण अभी बाकी था।
देश-विदेश के हर गाँव और शहर से पूजित 'रामशिलाएं' (ईंटें) अयोध्या भेजी जाने लगीं। 6 करोड़ से अधिक रामभक्तों ने इसमें अपना योगदान दिया। 10 नवंबर 1989 बिहार के दलित बंधु कामेश्वर चौपाल जी के कर-कमलों द्वारा रामजन्मभूमि पर पहली शिला रखकर शिलान्यास किया गया। 1990): लालकृष्ण आडवाणी जी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर से 10,000 किलोमीटर की भव्य रथ यात्रा शुरू की। गली-गली एक ही नारा गूँजने लगा— "रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे!" संतों ने 30 अक्टूबर 1990 को 'कारसेवा' (मंदिर निर्माण हेतु सेवा) का दिन तय किया। हालांकि सरकार ने रोकने के लिए कड़े प्रतिबंध लगाए, कर्फ्यू लगाया और ट्रेनें-बसें रोक दीं, फिर भी लाखों कारसेवक सब बाधाएँ तोड़कर अयोध्या की ओर बढ़ने लगे..."
यह थी राम जन्मभूमि के सदियों पुराने इतिहास, त्याग और भक्ति की गाथा का पहला भाग।
आगे क्या हुआ? कैसे कारसेवकों ने अयोध्या पहुँचकर संघर्ष किया? यह हम पढ़ेंगे इसके अगले भाग (भाग-2) में!
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