राष्ट्र उन्नायक आचार्य शंकर
भारत देवभूमि है और इसकी कोख से अनेकानेक विभूतियों ने जन्म लिया है, इनमें कुछ तो ऐसे थे, जिन्होंने इतिहास की धारा को ही मोड़ दिया। इन दिव्यात्माओं ने समय की प्रबल चुनौती का दृढ़ता से सामना करते हुए, समय की जड़ता एवं बन्धनों को समाप्त कर परिस्थितियों को आमूल-चूल बदल डाला। आचार्य शंकर ऐसे ही युग-पुरुष थे। मात्र बत्तीस वर्ष की अल्पायु में इतना अनुपम पुरुषार्थ किया जो किसी के लिये सम्भव नहीं था। आचार्य शंकर जैसा क्रांतिकारी संत विश्व के इतिहास में दूसरा नहीं हुआ। क्रांतिकारी वही है जो समाज की जड़ता, रूढ़िवादिता, असमानता और दासत्व वृत्ति को मिटा कर श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों की स्थापना करें। योगेश्वर श्रीकृष्ण ऐसे ही क्रांतिकारी महानायक थे। आचार्य विष्णुगुप्त 'चाणक्य' भी इसी श्रेणी के थे। आचार्य शंकर के समय भारतवर्ष में वैचारिक भ्रम बहुत ही भीषण था। गौतम बुद्ध ने जिन विचारों से हिन्दू समाज में जागृति उत्पन्न की, उन्हीं विचारों ने एक सम्प्रदाय का रूप लेकर अपने उद्देश्य को विस्मरित कर दिया। आचार्य शंकर के प्रादुर्भाव के समय बौद्ध सम्प्रदाय न केवल विकृति को प्राप्त हो गया, बल्कि उसमें ऐसे तत्व भी आ गये जो समाज और राष्ट्र से द्रोह व विश्वासघात करने लगे।
चुनौती बड़ी थी, किन्तु आचार्य शंकर ने अपने जीवन के छोटे से कालखण्ड में सम्पूर्ण परिस्थिति को बदल डाला। उन्होंने राष्ट्र में छायी नैराश्यता व अपनी संस्कृति के प्रति हीनता के भाव से भारत को उबारा। सनातन संस्कृति में व्याप्त मतभेदों को दूर कर राष्ट्र व धर्म को सुदृढ़ व संगठित कर दिया जिससे प्राचीन भारत के श्रेष्ठ जीवन मूल्यों की ताजा बयार पूरे देश में पुनः बहने लगी। गहन अंधकार नष्ट हो गया तया सनातन धर्म रूपी सूर्य की दिव्य किरणों ने पूरे राष्ट्र को आलोकित कर दिया। उन्हें यह प्रतीत हो गया था कि 'एक राष्ट्र’ होने का भाव भारत में कमजोर हो रहा है और राष्ट्रीयता की भावना का अभाव अनेक दोषों को जन्म देता है. इसलिये उन्होंने सम्पूर्ण देश की दो बार यात्रा की तथा भारत के चार कोनों में धर्म के संरक्षण हेतु चार मठ स्थापित किये। जो भारत की सांस्कृतिक एकता व राष्ट्र भाव के शक्तिपुंज के रूप में आज भी स्थापित हैं। आचार्य का उत्कृष्ट लेखन भी विस्मय उत्पन्न करता है। सूत्रों, उपनिषदों पर उनके भाष्य आज भी मापदण्ड बने हुए हैं। किसी भी भाष्य का मूल्यांकन आचार्य शंकर के भाष्य की तुलना करके ही किया जाता है।
ऐसे युगान्तर-कारी महापुरुष आचार्य शंकर के सम्बन्ध में आज की पीढ़ी को बड़ी अल्प जानकारी है। जीवनीकार उन्हें संतों - तपस्वियों की श्रेणी में रख देते हैं, जबकि वे राष्ट्र में नव-चैतन्य उत्पन्न करने वाले क्रांतिकारी सन्यासी तथा राष्ट्रनायक थे। उनका यह स्वरूप और पक्ष पाठकों तक पहुंचना चाहिये। बालकों के हृदय - पटल पर भी इसी प्रकार के भाव अंकित किये जाने चाहिये, इसी उद्देश्य पूर्ति हेतु यह चित्रकथा प्रस्तुत है।

शीर्षक : राष्ट्र उन्नायक आचार्य शंकर
संख्या: ……..
कुल पृष्ठ : 48
भाषा : हिंदी
प्रकाशक : शौर्यभूमि पब्लिकेशन
प्रथम प्रकाशित : 2024
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