मारीचि से भगवान महावीर
मानवता का चरमोत्कर्ष पौरुष की सुष्ठ पराकाष्ठा चैतन्य आत्मा के स्वरुप का अन्तिम निखार जब आलोकता के सुक्ष्मतम केन्द्र-बिन्दु पर पहुंच कर परमात्मा का रूप धारण कर लेता है तब तीनों लोकों के जीव मात्र उस कृत्य-कृत्य सत्व के पदार विन्दों में आत्म समर्पण करने के लिए लालायित हो उठते हैं। अन्तिम कुलकर मनु श्री नाभिराय जी के पुत्र युवराज ऋषभदेव ने स्वयं कर्म भूमि के प्रारम्भ में मनुष्यों को असि, मसि, कृषि, शिल्प, विद्या और वाणिज्य शिक्षा दे कर उनका सतत् विकास करने का परामर्श किया। आदिनाथ का पौत्र मारीची भी दीक्षा ले कर, छोड़ कर, मिथ्यामत का प्रचार किया। वही जीव भगवान महावीर स्वामी भी एक ऐसे ही आध्यात्मिक क्रान्ति के अग्रदूत युग पुरुष थे जिन्होनें ईश्वरवाद, स्वार्थवाद, पाखंडवाद, अवतारवाद की जड़े पूर्व भव में एक दो नही पूरे 363 मतों का प्रचलन कर जीव मात्र को संसार में भटकने की प्रेरणा दी। इस चित्र कथा में भगवान महावीर स्वामी के जन्म-जन्मांतरों को चित्रों द्वारा प्रदर्शित करने का सुप्रयास किया है। आत्मा का क्रमिक विकास किन उबड़-खाबड़ या उच्चमय परिस्थितियों से गुजर कर हो पाता है। अनेकों भवों के आधार पर अपना विकास कर जगत पूज्यत्व प्राप्त कर सके, उसी प्रकार प्रत्येक मानव की अपनी अन्तरंग आत्मा ईश्वरत्व सम्पन्न है। पुरुषार्थ द्वारा ईश्वर बना जा सकता है।
इस चित्र कथा से प्राणी अगर शाश्वत सुख शान्ति की अभिलाषा है तो अपनी आत्मा का विकास करें विकास की गति जितनी सशक्त होगी सुख शान्ति उतनी ही निकट होंगी। पुःन पुनः भव भाव भ्रमण से, वीतराग जिन विलग हुए। इन्द्रिय निग्रह तप संयम में, ज्ञानानन्दी सजग हुए।
डॉ. ब्रं रेखा जैन अष्टापद तीर्थ जैन मंदिर

Leave a Reply