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JCK-H-054-Siddhkshetra Maangitungi Ji

Thursday, 03/09/2026 05:33 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
54
Category
Other Pub.
Language
Hindi
JCK-H-054-Siddhkshetra Maangitungi Ji

JCK-H-054-Siddhkshetra Maangitungi Ji

Category 1
Category 4
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सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी जी

राम हणु सुग्गीनो, गवय गवास्खोय नील महानीलो।

णव णवदी वोड़ीओ तुंगी गिरी णिव्वुदे वन्दे।।


मांगीतुंगी 99 करोड़ महामुनिश्वरों की निर्वाण भूमि है। मांगी तुंगी की वंदनीय माटी आत्म साधना में सहकारी कारण है। इस क्षेत्र से राम, हनुमान, सग्रीव गव, गवाख्य नील महनील आदि निर्वाण को प्राप्त किया। जिन तीर्थों का दर्शन, स्मरण, वंदन, पूजन, भक्ति पूर्वक करता है। उसको प्रशस्त पुष्प मिलता है। तीर्थ भूमि के मार्ग की पवित्र रज से मनुष्य कर्म रज से रहित हो जाता है जो जीव तीर्थ पर जा कर भगवान की शरण ग्रहण करते हैं उनके मार्ग का अनुशीलन करते हैं वे जगत पूज्य साक्षात् भगवान बन जाते हैं। मांगी तूंगी पूर्व में दंडक नाम से जाना जाता था । पदम पुराण में इस का उल्लेख मिलता है। रामचंद्र को सिंहासन पर बैठने की अनुमति देकर पिता के बचन पूर्ण करने के लिए स्वंय इसी दण्डकारण्य वन में घूमते हुए आये थे। यह क्षेत्र काफी बड़ा है। इसी वन में सूर्य हास खड्ग की प्राप्ति हुई। बलभद्र की मूर्ति जो पहाड़ की तरफ मुख कर तथा संसार की ओर पीठ कर बैठे हैं ऐसी मूर्ति एक मात्र मांगीतुंगी में है।
यहाँ विशाल गुफाएँ हैं जहाँ भगवान मुनिसुव्रत की प्रतिमा विराजमान है। साथ ही अन्य तीर्थंकरों की मूर्तियाँ विद्यमान हैं। क्षेत्र पर समय-समय पर अनेकों चमत्कार होते रहते हैं। क्षेत्र के जीर्णोद्धार की प्रेरणा परम पू. पंचम पट्टाचार्य आचार्य श्रेयांस सागर जी का रहा, आज मांगीतुंगी दक्षिण भारत में सम्मदेशिखर के नाम से विख्यात है । क्षेत्र के विकास में परम पू. आर्यिका श्रेयांस मति माता जी का महान योगदान है । पू. माता जी क्षेत्र पर ही विराजमान है। जिनके चरण कमल देवताओं के मस्तक किरीटों से प्रतिबिम्बित हो रहा ऐसे सिद्धात्माओं की सिद्धी से ही इस परम पावन भूमि का नाम मांगीतुंगी जी कहलाया।

व्रं धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

  • जैन चित्र कथा 
  • शीर्षक : सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी जी
  • संख्या: 54
  • कुल पृष्ठ : 28
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : अष्टा पद तीर्थ जैन मंदिर
  • प्रथम प्रकाशित :

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