चौबीस तीर्थंकर भाग 2
तीर्थंकर जैन धर्म का एक पारिभाषिक शब्द है! जिसका भाव है, धर्म तीर्थ को चलाने वाला अथवा धर्म तीर्थ का प्रवर्तक कभी ऐसा भी समय आता है, जब धर्म का प्रभाव क्षीण होने लगता है, उसमें शिथिलता आती है। उस समय ऐसे प्रखर ऊर्जावान महापुरुष जन्म लेते हैं, जो धर्म परम्परा में आई मलिनता और विकृतियों का उन्मूलन कर धर्म के मूल स्वरूप को पुनः स्थापित करते हैं ऐसे ही जगतोद्धारक महान् उन्नायक महापुरुष तीर्थकर कहलाते हैं। ऐस तीर्थकर 24 होते हैं। तीर्थकर संसार रूपी सरिता को पार करने के लिए धर्म शासन रूपी सेतु का निर्माण करते हैं। धर्म शासन के अनुदान द्वारा अध्यात्मिक साधना कर जीवन को परम पवित्र और मुक्त बनाया जा सकता है। तीर्थकर महापुरुष से मंडित होते हैं। जो समस्त विकारों पर विजय पाकर जिनत्व को उपलब्ध कर लेते हैं और कैवल्य प्राप्य कर निर्वाण के अधिकारी बनते हैं।
वर्तमान कालचक्र में भगवान ऋषभदेव प्रथम और भगवान महावीर अन्तिम चौबीस तीर्थकर हुए हैं। चौबीस तीर्थकरों के घटना चक्र के बारे में चित्र कथाओं के माध्यम से बाल पीढ़ी को जानकारी मिल सके इस हेतु चौबीस तीर्थकरों को तीन भागों में पढ़ कर आत्म सात करें तीर्थंकरत्व की उपलब्धि सहज नहीं है। हर एक साधक आत्म साधना र मोक्ष को प्राप्त कर सकता है, पर तीर्थकर नही बन सकता। तीर्थंकरत्व की उपलब्धि बिरले साधकों को ही होती है। इसके लिए अनेकों जन्मों की साधना और कुछ विशिष्ठ भावनाएँ अपेक्षित होती हैं विश्व कल्याण की भावना से अनुप्राणित साधक जब किसी केवलज्ञान अथवा श्रुतु केवली के चरणों में बैठकर लोक कल्याण की सुदृढ भावना पाता है तभी तीर्थकर जैसी क्षमता को प्रदान करने में समर्थ तीर्थंकर प्रकृति नाम के महापुण्य कर्म का बन्ध करता है। इसके लिए सोलह कारण भावनाएं बताई गई है जो तीर्थकरव का कारण है पाठक गण इस चित्रकथा को पढ़कर तीर्थकरों की विशेष जानकारी प्राप्त करें।
धर्मचन्द शास्त्री अष्टापद तीर्थ जैन मंदिर

शीर्षक : चौबीस तीर्थंकर भाग 2
संख्या: 52
कुल पृष्ठ : 36
भाषा : हिंदी
प्रकाशक : अष्टा पद तीर्थ जैन मंदिर
प्रथम प्रकाशित :
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