संत गणेश वर्णी
बुंदेलखंड की उर्वरामाटी पर बैष्णव कुल में जन्म लेकर भी सरलता की मूर्ति वर्णी जी ने सत्य-अहिंसा का जीवन व्यापी व्रत ग्रहण किया। अशिक्षा के अंधकार मे डूबे समाज को उजियारे की किरणे प्रदान की। जीवन में कठोर श्रम और संघर्षो के बीच सफलता के बीज बोये। पूरे जीवन भर उन्होने परिस्थितियों को अपने उद्देश्य के सामने नत मस्तक कराया, थके नहीं। अनेकोनेक विपरीत स्थितियों में उन्होंने सत्य-अहिंसा को अपना कर आगम मार्ग को ही प्रचारित और पुष्पित किया। त्याग की मूर्ति वर्णी जी को आराध्य की तरह स्थान मिला और सैकड़ों हजारों महिलाओं और पुरुषों ने तरह-तरह के संयम धारण कर आगे का मार्ग अपनाया। उनके प्रवचन तलस्पर्शी एवं सहज, सरल, मोहक होते थे, जिसमें क्या आकर्षण था, वे श्रोता ही जानते हैं। इतना निष्प्रही संत अब कहाँ ? उनका कहना था “ त्यागी को संस्थावाद में नहीं पड़ना चाहिए - यह कार्य गृहस्थों का हैं - संस्थाबाद के दलदल में फँसने वाला तत्व लोकेषणा से दूर हो जाता है। व्रती विद्यालय स्थापित करने की भी उनकी चाह थी, और अंत में मुनि दीक्षा पूर्वक समाधि ली।
धर्मचंद शास्त्री
(आचार्य धर्म सागर जी सधस्थ)
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