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JCK-H-000-Kundkundakacharya

Friday, 11/09/2026 06:10 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
NA
Category
Other Pub.
Language
Hindi
JCK-H-000-Kundkundakacharya

JCK-H-000-Kundkundakacharya

Category 1
Category 4
NA

कुन्दकुन्दकाचार्य

आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी
दिगम्बर जैन समाज के महनीय आचार्यों में श्री कुन्दकुन्द स्वामी का स्थान कितना ऊँचा है, इसे कौन नहीं जानता? इनके महत्व के बारे में जैन समाज आज तक गुणगान गाता आ रहा है।

मंगलम् भगवान वीरो मंगलम् गोतमो गणी मंगलम् कुंदकुंदाद्यौ जैन धर्मोस्तु मंगलम् ॥
भगवान महावीर पहला मंगल है, दूसरा मंगल गौतम गणधर जी, तथा तीसरा मंगल कुन्दकुन्द आचार्य है, चौथा मंगल जैनधर्म है। आचार्य श्री का जन्म स्थान कुन्दपुर था तथा प्रथम नाम पद्मनन्दि था। आचार्य श्री संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओं के निष्णात् विद्वान थे। अध्यात्म जगत को आत्मशोधन करने की प्रेरणा की, तथा 84 पाहुड़ (ग्रन्थ) लिखे हैं । जिसमें सबसे प्रमुख ग्रन्थ है समयसार, जिसमें नव पदार्थों के श्रद्धान के माध्यम से जीव को मुक्ति प्राप्त करने का उपाय प्रतिपादित है। आचार्य श्री के विशेष पुण्य से देव आपको विदेह क्षेत्र ले गए, जहाँ पर साक्षात् सीमंधर भगवान के समोशरण में उनके दर्शन एवं उनकी दिव्यवाणी सुनी। आचार्य श्री के द्वारा जब दिगम्बर एवं श्वेताम्बर में मतभेद उभरा तथा आचार्य श्री ने समाधान दिया। मन्त्र के माध्यम से पाषाण निर्मित मूर्ति अंबिका जी के मुख से समाधान कराया। आचार्य श्री ने अपनी तपस्या तमिलनाडु के पौन्नुरमलई नामक स्थान जो आज भी अपने तप त्याग को स्मरण करा रहा है। आचार्य श्री की सेवा सर्वश्रेष्ठ कही जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसीलिए आचार्य कुन्दकुन्द को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ। ऐसे आचार्य भगवन्त के चरणों में त्रिकाल नमोस्तु करता हूँ।

 

ब्र. धर्मचन्द शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

  • जैन चित्र कथा   
  • शीर्षक : कुन्दकुन्दकाचार्य
  • संख्या: ..
  • कुल पृष्ठ : 28
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत्र ग्रंथमाला
  • प्रथम प्रकाशित : 2004

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