धरती पर स्वर्ग
सामान्य मानव धरती को दुःखमय और स्वर्ग को सुखमय मानकर सोचता है - काश, इस धरती पर वह स्वर्ग उतर आये जहाँ सभी सद्भाव, प्रेम और शान्ति के साथ रहते हों, राजा न्याय-नीति से प्रजा का पालन करता हो, कष्ट, अभाव, युद्ध और हिंसा का ताण्डव जहाँ नहीं हो। ऐसे स्वर्गिक सुख की कल्पना में मनुष्य का मन रमा रहता है, किन्तु पता नहीं कब वह शुभ समय आयेगा जब मनुष्य की यह कल्पना साकार होगी, धरती पर स्वर्ग उतर आयेगा। धरती पर स्वर्ग की इस मधुर कल्पना को साकार करने के लिए मनुष्य के स्वभाव, व्यवहार और चिन्तन की दिशा बदलनी होगी। व्यवहार बदलने पर संसार भी बदल जाता है। प्रस्तुत कथा में इसी आदर्श कल्पना को मूर्तिमंत किया गया है। एक पौराणिक कथा के माध्यम से मानव जाति को आधुनिक युग में भी सुख - शान्ति तथा सद्भावपूर्वक रहने / जीने की वह सुखद व्यावहारिक योजना प्रस्तुत की गई है जिसके आधार पर युद्ध बन्द हो सकते हैं, गरीबों का उत्पीड़न रुक सकता है, व्यापारियों का भय एवं धार्मिक कलह दूर हो सकता है और देश के प्राकृतिक साधनों का विनाश रुक सकता है।
रंगावती के राजा लक्ष्मीपति का पुत्र मेघकुमार एक आदर्श चरित्र का शासक है। अपने कला-कौशल तथा परोपकार वृत्ति के कारण तथा उच्च चरित्रनिष्ठा एवं सत्यवादिता के बल पर अनेक असंभव कार्य सम्पन्न करता है । अपने राज्य में उसने पाँच आदेश लागू किये जो आज की परिस्थितियों में बहुत ही प्रासंगिक एवं उपयोगी हैं। शांति और प्रजा के रक्षण के लिए उसने आक्रान्ता के समक्ष समर्पण नहीं करके ट्रस्टीशिप के सिद्धान्त का आदर्श प्रस्तुत किया। राजा राज्य का स्वामी नहीं, रखवाला होता है। इन आदर्श सिद्धान्तों के आधार पर उसने अपने राज्य को ही धरती पर स्वर्ग जैसा सुन्दर और सुख - शान्ति सम्पन्न आदर्श राज्य बना दिया।
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