ऋषिदत्ता
जीवन में सुख-दुःख धूप-छाया की तरह आते रहते हैं। साधारण मनुष्य सुख में सुखी और दुःख में दुःखी हो जाता है। परन्तु ज्ञानी मानव सुख-दुःख को अपने ही किये कर्मों का फल-भोग मानकर दोनों अवस्थाओं में समभाव रखता है। अपना मानसिक संतुलन बनाये रखता है। संतुलित विचार वाला मानव जीवन में कभी हारता नहीं। कष्ट पाकर भी टूटता नहीं और सुखों में भी स्वयं को संयमित रखता है। वह अपने घोर अपराधी को भी क्षमा कर सकता है और सभी के साथ प्रेम- मैत्री का भाव बनाये रखता है।
सती ऋषिदत्ता का चरित्र हमें यह जीवन सन्देश देता है कि जो तुम्हारा बुरा करता है उस पर भी क्षमा करो और कष्टों को अपना कर्म-फल मानकर समता पूर्वक भोगो। जैन कथा साहित्य में ऋषिदत्ता चरित्र बहुत प्रसिद्ध है। 10वीं शताब्दी में नाइल कुल के गुणपाल मुनि ने प्राकृत भाषा में 'इसिदत्ता चरियं' ग्रंथ की रचना की थी। इसके आधार पर संस्कृत, गुजराती और राजस्थानी भाषा में भी ऋषिदत्ता चरित्र पर अनेक रचनाएँ हुईं। ऋषिदत्ता एक तापस ऋषि हरिषेण की पुत्री थी। किन्तु बाद में धर्मघोष आचार्य का उपदेश सुनकर उसने निर्ग्रन्थ धर्म स्वीकार कर लिया। जैन कथा साहित्य में सती ऋषिदत्ता नाम से उसका चरित्र प्रसिद्ध है। महासती कमलावती जी की सुशिष्या विदुषी साध्वी श्री शांताकुमारी जी म. ने ऋषिदत्ता का कथानक प्रस्तुत कर हमें अनुग्रहीत किया है। हम आपके आभारी हैं।
- महोपाध्याय विनय सागर - श्रीचन्द सुराना 'सरस'
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