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DWC-H-024-Vachan Ka Teer

Saturday, 12/09/2026 07:57 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
24
Category
Other Pub.
Language
Hindi
DWC-H-024-Vachan Ka Teer

DWC-H-024-Vachan Ka Teer

वचन का तीर
भगवान महावीर ने कहा है- हम जो कुछ बोलते हैं उन शब्दों का प्रभाव केवल श्रोता के मन पर ही नहीं पड़ता, अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही उन शब्द - तरंगों से आन्दोलित हो उठता है । इसलिए बोलने से पहले बुद्धि और विवेक से तोल लेना चाहिए कि मेरे इन शब्दों से किसी का मन दुःखी और संतप्त तो नहीं हो उठेगा। मेरे मुँह से निकले वचन किसी के लिए बम से भी अधिक भयानक और विनाशकारी तो नहीं होंगे। इस वचन - विवेक के सन्दर्भ में भगवान महावीर ने एक बात बड़ी महत्त्वपूर्ण कही है-नेव वम्फेज्ज मम्मयं - मर्म वचन (ताना या गुप्त रहस्य खोलना) बोलकर कभी किसी के मन में घाव नहीं करना चाहिए।
जैन साहित्य में मर्म वचन बोलने का विनाशकारी परिणाम बताने वाली एक कहानी प्रसिद्ध है। जिसमें बताया है - एक नारी ने गरीबी से तंग आकर अपने पति को मौत के मुँह में धकेल दिया। भाग्य से पति बच गया। उसने धन कमाया। उजड़ा परिवार फिर आबाद हुआ। एक पुत्र हुआ। पुत्र का विवाह होने पर पुत्रवधू बड़ी कर्कश स्वभाव वाली कठोर भाषिणी और कलहकारिणी आई। बात ही बात में एक दिन बहु ने सास को ताना मार दिया कि तुम वही तो हो जिसने अपने पति को चलती गाड़ी से धक्का मारकर मौत के मुँह में धकेला था। इस मर्म वचन की चोट से आहत सास ने सोचा - दुनिया को अब मैं क्या मुँह दिखाऊँगी ? और उसने आत्महत्या कर ली। स्वयं को उसी हादसे का दोषी मानकर पति ने, फिर पुत्र और पुत्रवधू ने भी आत्महत्या कर ली। इस तरह एक भरापूरा सुखी परिवार मर्म वचन के कारण बर्बाद हो गया।
उपाध्याय श्री केवल मुनि जी ने उक्त कहानी को आधुनिक पारिवारिक सन्दर्भों में ढालकर 'वचन का तीर' नामक एक बड़ा ही मर्मस्पर्शी उपन्यास लिखा है। प्रस्तुत में उसी उपन्यास की रचना शैली के आधार पर यहाँ 'वचन का तीर' प्रस्तुत है जो हमें बोलने से पहले तोलने की शिक्षा देता है और मर्मवचन के विनाशकारी परिणामों से सावधान भी करता हुआ हित - मित-मधुर बोलने का सन्देश सुनाता है।
-महोपाध्याय विनयसागर    - श्रीचन्द सुराना 'सरस'

  • दिवाकर चित्र कथा   
  • शीर्षक : वचन का तीर
  • संख्या: 24
  • कुल पृष्ठ : 36
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : श्री दिवाकर प्रकाशन
  • प्रथम प्रकाशित : ……

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