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DWC-H-017-Bhagwan Mallinath

Saturday, 12/09/2026 09:29 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
17
Category
Other Pub.
Language
Hindi
DWC-H-017-Bhagwan Mallinath

DWC-H-017-Bhagwan Mallinath

भगवान मल्लीनाथ
जैनधर्म की एक अद्वितीय विशेषता है कि वह आत्म-शुद्धि व आत्म-कल्याण की साधना में वर्ण, जाति, रंग व लिंग का कोई भौतिक भेद मान्य नहीं करता। पुरुष और स्त्री, शूद्र और ब्राह्मण, काला या गोरा कोई भी व्यक्ति तप, ध्यान - समता-संयम की निर्दोष, निर्विकल्प साधना / आराधना करके आत्मा को आध्यात्मिक विकास की चरम स्थिति अरिहंत - सिद्ध पद तक पहुँचा सकता है। साथ ही यह भी मान्यता है कि क्रोध, अहंकार, कपट आदि मानसिक दोष किसी भी साधना को मलिन व दूषित कर देते हैं। भौतिक क्षेत्र में ही नहीं अपितु, आध्यात्मिक क्षेत्र में और आध्यात्मिक विकास के निमित्त भी अहंकार कपट आदि का स्वल्प आचरण भी निषिद्ध है।
उग्र तप:साधना में प्रतिस्पर्धापूर्वक आगे बढ़ने की भावना से अल्प-सा छल-कपट आचरण भी सम्यक्त्व की निर्मलता को दूषित कर देता है। भगवान मल्लीनाथ की जीवन कथा में यह बात बड़ी मार्मिकता के साथ बताई गई है। भगवान मल्लीनाथ ने पूर्व जन्म में आचरित घोर तप के साथ स्वल्पतम कपट के कारण स्त्री देह में जन्म लिया । संसार में अलौकिक शारीरिक रूप लावण्य प्राप्त करके वे अद्वितीय विश्वसुन्दरी के रूप में अनेक राजाओं के मोह-आकर्षण का केन्द्र बनीं। एक नारी के लिए छह पराक्रमी राजाओं का विवाह प्रस्ताव आया और प्रस्ताव अमान्य हो जाने पर भयंकर युद्ध की स्थिति को मल्लीकुमारी ने बड़ी कुशलता व चतुरता के साथ टाला। इतना ही नहीं, रूप-सौन्दर्य पर मुग्ध राजाओं को मानव-शरीर की सुन्दर चमड़ी के भीतर छिपे मल-मूत्र आदि दुर्गन्धित पदार्थों की उपस्थिति का बोध कराकर शरीर सौन्दर्य की आसक्ति व मोह-मूढ़ता से छुटकारा दिलाया। उनके मोहग्रस्त मन के अँधेरे में ज्ञान व वैराग्य का दीपक जलाकर आत्म-कल्याण का मार्ग दिखाया।
ज्ञातासूत्र के आठवें अध्ययन में भगवान मल्लीनाथ की यह विस्तृत जीवन कथा वर्णित है। जिसे शब्दांकित किया है आचार्य श्री विजयकलापूर्ण सूरीश्वर जी महाराज के विद्वान् शिष्य मुनि श्री कीर्तिरल विजय जी महाराज और मुनि श्री हेमचन्द्र विजय जी महाराज ने इस अनुग्रह के लिए हम आभारी हैं।
             -महोपाध्याय विनयसागर           -श्रीचन्द सुराना 'सरस'

  • दिवाकर चित्र कथा   
  • शीर्षक : भगवान मल्लीनाथ
  • संख्या: 17
  • कुल पृष्ठ : 36
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : श्री दिवाकर प्रकाशन
  • प्रथम प्रकाशित : ……

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