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ACK-H-409-Mahabharat 41-Ashwamegh Yagya

Wednesday, 14/10/2026 08:00 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
409
Category
ACK
Language
Hindi
ACK-H-409-Mahabharat 41-Ashwamegh Yagya

ACK-H-409-Mahabharat 41-Ashwamegh Yagya

महाभारत 41 अश्वमेघ यज्ञ
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा, स्वयं व्यास की आज्ञा से उनके शिव्य वैशम्यायन ने उसे सत्यके बीच पढ़े कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के यौत्र के प्रपौत्र राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था. ये ऋषि-मुनि जनमेजय के सर्पसत्र (नारहें वर्षों तक चलनेवाले सर्पयज्ञ) में एकट हुए थे। हमारे द्वारा प्रस्तुत महाभारत के पिछले खंड में इसका वर्णन था कि किस प्रकार युद्ध में जीवित बचे लोगों ने युद्धभूमि में जा कर मारे गये वीरों को देखा और शोक मनाचा। महर्षि व्यास ने बीच बचाव करके गांधारी को पांडवों को शाप देवे से रोका। किंतु युद्ध भूमि के भयानक और करुणाजनक दृश्य से उदिग्न होकर गांधारी ने युद्ध का पूरा दोष कृष्ण पर मेड़ा। इस बीच कुन्ती ने यह रहस्य युधिष्टिर के सामनें खोला कि कर्ण वास्तव में कौन था। युधिष्टिर को अब अनुभब होने लगा कि इस सारे विनारा और दुःस्ब का कारण मैं ही हूं और शोक विहल हो कर वह वलवास करने जाने की सोचने लगा, किंतु समेइग- चुझा कर उसे रोका गया। अंत में हस्तिनापुर में उसका शानदार राज्याभिषेक हुआ। कृष्ण और व्यास के सुझाव पर उसने कई दिनों तक भीष्म पितामह से राजधर्म के संबंध में प्रवचन सुना।

  • अमर चित्र कथा 
  • महाभारत-41   
  • शीर्षक : अश्वमेघ यज्ञ
  • संख्या: 409
  • कुल पृष्ठ : 40
  • भाषा : हिंदी
  • प्रकाशक : इंडिया बुक हाउस प्रा. लि.
  • प्रथम प्रकाशित : 1 जनवरी 1990

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