महाभारत 41 अश्वमेघ यज्ञ
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा, स्वयं व्यास की आज्ञा से उनके शिव्य वैशम्यायन ने उसे सत्यके बीच पढ़े कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के यौत्र के प्रपौत्र राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था. ये ऋषि-मुनि जनमेजय के सर्पसत्र (नारहें वर्षों तक चलनेवाले सर्पयज्ञ) में एकट हुए थे। हमारे द्वारा प्रस्तुत महाभारत के पिछले खंड में इसका वर्णन था कि किस प्रकार युद्ध में जीवित बचे लोगों ने युद्धभूमि में जा कर मारे गये वीरों को देखा और शोक मनाचा। महर्षि व्यास ने बीच बचाव करके गांधारी को पांडवों को शाप देवे से रोका। किंतु युद्ध भूमि के भयानक और करुणाजनक दृश्य से उदिग्न होकर गांधारी ने युद्ध का पूरा दोष कृष्ण पर मेड़ा। इस बीच कुन्ती ने यह रहस्य युधिष्टिर के सामनें खोला कि कर्ण वास्तव में कौन था। युधिष्टिर को अब अनुभब होने लगा कि इस सारे विनारा और दुःस्ब का कारण मैं ही हूं और शोक विहल हो कर वह वलवास करने जाने की सोचने लगा, किंतु समेइग- चुझा कर उसे रोका गया। अंत में हस्तिनापुर में उसका शानदार राज्याभिषेक हुआ। कृष्ण और व्यास के सुझाव पर उसने कई दिनों तक भीष्म पितामह से राजधर्म के संबंध में प्रवचन सुना।

ACK-H-391-Mahabharat 32-Dharashayi Bheeshm
ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya
ACK-H-395-Mahabharat 34-Abhimanyu Ka Vadh
ACK-H-397-Mahabharat 35-Jayadrath Vadh
ACK-H-399-Mahabharat 36-Madhyaratri Ka Yuddh
ACK-H-402-Mahabharat 37-Senapati Karn
ACH-H-404-Mahabharat 38-Kuruon Ka Parabhav
ACK-H-406-Mahabharat 39-Yuddh Ke Uparant
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