महाभारत 37 : सेनापति कर्ण
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा। स्वयं न्यास की आज्ञा से उनके शिष्य वैशम्पायन ने उसे सबके बीच पढ़ कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के पौत्र के प्रपौत्र राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था। ये ऋहषि-मुनि जनमेजय के सर्पसत्र (बारह वर्षों तक चलनेवाले सर्पयज्ञ) में एकत्र हुए थे।महाभारत के हमारे द्वारा प्रस्तुत छत्तीसवें खंड में इसका वर्णन था कि किस प्रकार से कौरव सेनाएं अर्जुन के आक्रमण से हिम्मत हार बैठीं और बिखर गयीं। चौदहवें दिन सेनाओं ने प्रतिदिन की भांति सूर्यास्त के साथ लड़ाई बंद नहीं की, बल्कि सारी रात मशालों की रोशनी में युद्ध जारी रखा। अपनी राक्षस-सेना के साथ भीम के बेटे घटोत्कच ने रात के अंधकार का लाभ उठाने हुए, कौरव-सेना को बहुत परेशान किया। उसे नष्ट करने के लिए कर्ण को अपने दिव्य अस्त्र "शक्ति का उपयोग करना पड़ा, जिसे उसने अर्जुन के लिए बचा रखा था।उधर छल से द्रोण को यह विश्वास करा दिया गया कि उनका प्रिय पुत्र अश्वत्थामा मारा गया है। उससे द्रोण की जीने की इच्व समाप्त हो गयी, उन्होंने शस्त्र डाल दिये और धृष्ट्रद्युम्न हमले के शिकार हो गये।
ACK-H-391-Mahabharat 32-Dharashayi Bheeshm
ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya
ACK-H-395-Mahabharat 34-Abhimanyu Ka Vadh
ACK-H-397-Mahabharat 35-Jayadrath Vadh
ACK-H-399-Mahabharat 36-Madhyaratri Ka Yuddh
ACH-H-404-Mahabharat 38-Kuruon Ka Parabhav
ACK-H-406-Mahabharat 39-Yuddh Ke Uparant
ACK-H-408-Mahabharat 40-Yudhisthir Ka Rajtilak
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