सद्दालपुत्र
भगवान महावीर के दस प्रसिद्ध श्रावकों में एक था 'सद्दालपुत्र'। सद्दालपुत्र अपने युग का एक कुशल और सफल शिल्प व्यवसायी था, जिसे उस युग की भाषा में गाथापति या कुंभकार कहा गया है। मिट्टी के सुन्दर कलात्मक बर्तन बनाने और बेचने के पैतृक व्यवसाय के साथ ही वह कृषि एवं पशुपालन का व्यवसाय भी करता था। जैन आगमों के वर्णन से पता चलता है कि व्यवसाय के साथ-साथ वह धर्म एवं अध्यात्म के विषय में भी विशेष ज्ञान रखता था। तत्कालीन आजीवक मत के आचार्य गौशालक की संप्रदाय का वह प्रमुख स्तंभ था। गौशालक का सिद्धान्त था “जिसकी जैसी होनहार होती है, उसी अनुसार सब कुछ अपने आप होता जाता है। मनुष्य भाग्य के हाथों की कठपुतली मात्र है।" सद्दालपुत्र भी इसी नियतिवाद को मानता था, किन्तु भगवान महावीर पुरुषार्थ या कर्मवाद का उपदेश देते थे- "मनुष्य जैसा कर्म करता है वैसा ही फल पाता है। अपने भाग्य को बनाने वाला स्वयं मानव ही है।" सद्दालपुत्र को भगवान महावीर ने पुरुषार्थवाद के इस सिद्धान्त को बड़ी व्यवहारिक युक्तियों से समझाया। जिसे समझकर वह नियतिवाद को छोड़कर पुरुषार्थवाद का सच्चा अनुयायी बन गया।
भगवान महावीर के सत्य सिद्धान्तों के प्रति उसके मन में इतनी गहरी आस्था जम गई कि गौशालक के लाख प्रयत्न करने पर भी वह उनसे नहीं डिगा। देवताओं ने उसकी दृढ़ धार्मिकता की कठोर परीक्षा ली उसमें भी वह उत्तीर्ण हुआ और जीवन के अन्त तक अपनी धर्म आराधना करता रहा। इस पुस्तक में उपासकदशा सूत्र के आधार पर सद्दालपुत्र की यह कथा लिखी है। इसमें दूसरी कथा के पात्र हैं विजय कुमार और विजया। विवाह की प्रथम रात से ही अखण्ड ब्रह्मचर्य पालन की प्रतिज्ञा करते हैं, और जीवनभर उस पर अडिग रहते हैं। जैन कवियों ने इस कथानक पर संस्कृत, गुजराती, राजस्थानी में अनेक रचनाएँ की हैं।
-महोपाध्याय विनय सागर - श्रीचन्द सुराना "सरस”
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