श्रीमद् राजचन्द्र
अध्यात्म पुरुष श्रीमद् राजचन्द्र जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा सम्वत् 1924, रविवार, रात्रि दो बजे हुआ था। उनका जीवन अनेक प्रेरक घटनाओं से ओतप्रोत था। वे चार वर्ष की आयु तक लक्ष्मीनन्दन नाम से जाने जाते रहे। बाद में उन्हें 'रायचन्द' नाम दिया गया और वे भविष्य में "श्रीमद् राजचन्द्र" के नाम से प्रसिद्ध हुए। सात वर्ष की अल्प आयु में श्रीमद् जी को पाठशाला में पढ़ने भेजा गया। बालक राजचन्द्र की स्मरण शक्ति इतनी तेज थी कि एक बार पाठ पढ़ लें या सुन लें तो उन्हें पूरा का पूरा पाठ याद हो जाता था। काव्य प्रतिभा के धनी थे। सम्वत् 1944 में उनका विवाह झबकबाई से हुआ था। श्रीमद् मुम्बई आकर जवाहरात का व्यापार करने लगे। जिसमें वे बहुत ही सफल हुए। वे एक सद्गृहस्थ थे। उनकी चार सन्तानें थीं। श्रीमद् अपने जीवन में धर्म को अनिवार्य समझ कर उसी में ओतप्रोत रहते थे। उन्होंने सम्वत् 1957 में राजकोट में देह त्याग किया।
श्रीमद् जी को बाल्यावस्था से ही अपनी अलौकिक आत्मशक्ति को विभिन्न कार्यों में एक साथ एकाग्र कर पाने की अद्भुत क्षमता प्राप्त थी। इस का प्रदर्शन उन्होंने अष्टावधान तथा शतावधान के प्रयोग जन साधारण के समक्ष कर दिखाया था। उन्हें सात वर्ष की आयु में जाति-र-स्मरण ज्ञान (पूर्व भवों का ज्ञान) हो गया था। ये उपलब्धियाँ उनकी आत्मा की निर्मलता के कारण संभव हो सकीं। श्रीमद् जी ने अपने आध्यात्मिक विचारों को समाज पर थोपने का प्रयत्न कभी नहीं किया और न ही अपना कोई पृथक् सम्प्रदाय स्थापित किया। उन्होंने स्वयं जिनेन्द्र भगवान के सिद्धान्तों को अपने जीवन में उतार कर भगवान महावीर के उपदेशों को मूर्तरूप दिया। अपनी माँ के विरोध के कारण दीक्षा नहीं ली। उन्होंने अपने मुमुक्षु भक्तों के कल्याण के लिए जिनवाणी को सरल, सुगम्य गुजराती भाषा में पत्रों एवं काव्यों के रूप में प्रस्तुत किया। उनके सरल, स्पष्ट एवं सत्य - सिद्धान्तों पर आधारित जीवन चरित्र के कारण महात्मा गाँधी जैसे लोग भी प्रभावित हुए थे। ऐसे तेजस्वी पुरुष का जीवनवृत्त कथा चित्रों के रूप में प्रस्तुत करते हुए हमें प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। इस पुस्तक प्रकाशन में श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम, आगास का विशेष योगदान रहा। हम उनके आभारी हैं।
-महोपाध्याय विनय सागर - श्रीचंद सुराना "सरस
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