महाभारत 29 : शांतिदूत श्रीकृष्ण
भरतवंश की गाथा पर महर्षि वेदव्यास ने महाभारत नाम का महाकाव्य रचा। स्वयं व्यास की आज्ञा से उनके शिष्य वैशम्पायन ने उसे सबके बीच पढ़ कर सुनाया। यह कथावाचन व्यास के पौत्र के प्रपौत्र राजा जनमेजय और अनेक ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में हुआ था। ये ऋषि-मुनि जनमेजय के सर्पसत्र (बारह वर्षों तक चलने वाले सर्पयज्ञ) में एकत्र हुए थे।
महाभारत के अट्ठाईसवें खंड में इसका वर्णन था कि संजय ने किस प्रकार पांडवों का संदेश कौरवों के दरबार में कह सुनाया। वहां उस पर बड़ी बहस हुई और दुर्योधन ने साफ-साफ कह दिया कि मैं पांडवों को राज्य में हिस्सा हरगिज नहीं दूंगा। उस खंड का अंत इसके साथ हुआ था कि श्रीकृष्ण ने स्वयं हस्तिनापुर जाने और कौरव-पांडवों के बीच सुलह-समझौते का प्रयत्न करने का जिम्मा उठाया। 
ACK-H-383-Mahabharat 28-Duryodhan Ka Duragrah
ACK-H-387-Mahabharat 30-Senayein Kurukshetra mein
ACK-H-389-Mahabharat 31-Senapati Bheeshm
ACK-H-391-Mahabharat 32-Dharashayi Bheeshm
ACK-H-393-Mahabharat 33-Dron Ki Pratigya
ACK-H-395-Mahabharat 34-Abhimanyu Ka Vadh
ACK-H-397-Mahabharat 35-Jayadrath Vadh
ACK-H-399-Mahabharat 36-Madhyaratri Ka Yuddh
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