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Gaurav Gatha-H-03-Netaji Subhashchandra Bose

Monday, 30/03/2026 08:49 PM
Author
Chief Editor
Volume/Serial
03
Category
GG
Language
Hindi
Gaurav Gatha-H-03-Netaji Subhashchandra Bose

Gaurav Gatha-H-03-Netaji Subhashchandra Bose

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Category 4
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नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नाम भारत का बच्चा-बच्चा जानता है नेताजी स्व्तन्त्रता संग्राम के अमर सेनानियों में से एक है। नेताजी का जन्म 23 January 1897 को कटक में श्री जानकी दास जी के घर में हुआ। नेताजी बचपन से ही मेधावी छात्र थे। माता प्रभावती और स्वामी विवेकानन्द जी का प्रभाव इन पर बहुत पड़ा, कॉलेज में अंग्रेज प्रोफेसरों के गलत व्यवहार को ये सहन नहीं कर सके और एक अंग्रेज को पीट डाला और नेताजी को 2 साल के लिए कॉलेज से निकल दिया फिर भी 1919 मैं बी ए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की फिर नेताजी महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल हो गये और इन्हें 6 महीने का कारावास हुआ। 1938 में नेताजी हरिपुरा राष्ट्रीय महासभा (कांग्रेस) के प्रधान चुने गये। 29 जनवरी 1941 को नेताजी चुपके से देश से बाहर चले गये और हिटलर और मुसोलिनी जैसे नेताओं से मिले। फिर नेताजी ने बैंकाक में आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की और वंहा रहने वाले हिन्दुस्तानियों ने उनकी तन-मन-धन से सहायता की। आजाद हिन्द सेना देश को आजाद करने के लिए भारत की ओर चल पड़ी, अंग्रेज भी आजाद हिन्द सेना से हार मानने लगे।

नेताजी कहते थे “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के साथ ही सारा संसार कांप उठा, आजाद हिन्द फ़ौज को जापान से मिलने वाली सहायता नहीं मिल सकी। जिसके कारण नेताजी की योजना अधूरी रह गयी और आजाद हिन्द फ़ौज के काफी सैनिक बन्दी बना लिए गये। नेताजी जिस विमान में गये थे, उसका आज तक पता नहीं लगाI ऐसा कहते हैं कि विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गयी। जो भी हो आज भी हम भारतवासियों के मन में नेताजी हमेशा जिन्दा रहेंगे और मन में सदा उनके लिए सम्मान रहेगा। 

"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" भारतजननी की गुलामी की लोह बेड़ियाँ काटने का दृढ़ संकल्प और मनप्राण से उसकी सेवा, यही सुभाष चन्द्र बोस का जीवन परिचय है। 23 जनवरी, 1897 को कट्टक में जन्मे सुभाष का जीवन साहस, देशप्रेम और मातृभूमि के प्रति समर्पण का ही लेखा-जोखा है। किशोरावस्था में 'गुरु' की तलाश में भटकने के बाद सुभाष के मन को आध्यात्मिक शान्ति मिली। विवेकानन्द और अरविन्द के दर्शन में। इसी दर्शन के कारण इंग्लैंड में प्राई०सी०एस० की परीक्षा में चतुर्थ स्थान प्राप्त करने वाले सुभाष, ऐशो-आराम की ज़िदगी छोड़ सक्रिय राज- नीति में चले आए। अप्रतिहत साहस और अपराजित व्यक्तित्व ने जहाँ उन्हें जन-जन का प्रिय आदर्श 'नेताजी' बनाया, वहीं ब्रिटिश सरकार का 'प्रिय' शत्रु। 1921 से 1940 इन बीस वर्षों में सुभाष को कम से कम 12 बार जेल हुई। 1938 और 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष रूप में सुभाष का चुनाव किया गया। अध्यक्ष रूप में उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध में उलझी सरकार को भारत छोड़ने की पहली चुनौती दी। लेकिन गांधी जी से वैचारिक मतभेद के कारण कांग्रेस से त्याग पत्र देकर उन्होंने 'फारवर्ड ब्लॉक' नामक पार्टी का गठन किया। जुलाई 1940 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया पर खराब स्वास्थ्य के कारण छोड़ दिया गया। अब, विदेशी शक्तियों का सहयोग पाने के लिए सुभाष कलकत्ते से भाग निकले। गूंगा-बहरा पठान चिनाउद्दीन बनकर वे छिपते- छिपाते काबुल पहुंचे। काबुल पहुंचने तक के रास्ते की कठिनाइयां, इटली अम्बैस्सी द्वारा सहायता पाने से पहले का छिपना भागना, पूर्वी एशिया पहुंचने के लिए पनडुब्बी में 90 दिन, आज़ाद हिन्द फौज की स्थापना, 'दिल्ली चलो' और 'जय हिन्द' के गूंजते स्वर- इन रहस्य - रोमांचपूर्ण घटनाओं से भरे जीवन का अन्त भी रहस्य ही रह गया।

  • गौरव गाथा
  • शीर्षक          : नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
  • अंक              : 03
  • कुल पृष्ठ        : 36
  • भाषा            : हिंदी
  • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
  • प्रकाशन वर्ष : अक्टूबर 1980

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