अमर चित्र कथा: नरसिम्हा रेड्डी रॉयलसीमा का शेर
शेरदिल नरसिम्हा रेड्डी: एक महान योद्धा की कहानी! यह उय्यालवाड़ा नरसिम्हा रेड्डी की वीरता की गाथा है।
यह कहानी 19वीं सदी की है, जब भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी अपना पैर पसार रही थी। अंग्रेज भारत के राजाओं और किसानों पर अपना कब्जा जमा रहे थे। वे बहुत क्रूर थे और भारतीय लोगों पर भारी टैक्स या लगान थोप रहे थे। इसी दौर में दक्षिण भारत के रेनाडू (जिसे आज रायलसीमा कहा जाता है) में एक महान नायक का जन्म हुआ—नरसिम्हा रेड्डी। नरसिम्हा रेड्डी बचपन से ही बहुत बुद्धिमान थे। उनके मन में हमेशा एक सवाल रहता था कि "बाहर से आए हुए कुछ लोग हमारे ही देश के लोगों को यह कैसे बता सकते हैं, कि हमें कैसे जीना चाहिए?"
उनके इन्ही सवालों और मन की आग को एक ज्ञानी संत, गोसाईं वेंकन्ना ने पहचाना। गुरु वेंकन्ना ने नरसिम्हा को न केवल शस्त्र चलाना सिखाया, बल्कि उन्हें एक महान योद्धा के रूप में तैयार किया। उन्होंने नरसिम्हा को सिखाया कि अन्याय के खिलाफ चुप रहना भी पाप है।
नरसिम्हा रेड्डी ने देखा कि अंग्रेज किसानों का खून चूस रहे हैं। उन्होंने अकेले ही अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोलने का फैसला किया। उन्होंने समाज के हर वर्ग के लोगों को इकट्ठा किया। उन्होंने किसानों, मजदूरों और आम लोगों को भर्ती करके एक शक्तिशाली सेना बनाई। नरसिम्हा ने इन साधारण लोगों को बहुत ही कम समय में कुशल और निडर लड़ाकों में बदल दिया। और इस सेना को लेकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। नरसिम्हा रेड्डी की यह लड़ाई दक्षिण भारत में अंग्रेजों के खिलाफ पहली बड़ी लड़ाइयों में से एक थी। उनकी सेना ने अंग्रेजों के किलों पर हमला किया और उन्हें कड़ी टक्कर दी। नरसिम्हा की वीरता देखकर अंग्रेज भी उनसे डरने लगे थे। वह गोरिल्ला युद्ध की कला में माहिर थे, जिससे उन्होंने ब्रिटिश सेना की नाक में दम कर दिया था।
इसके बाद अंग्रेजों को समझ आ गया था कि वे नरसिम्हा को आमने-सामने की जंग में नहीं हरा सकते। इसलिए उन्होंने छल का सहारा लिया। बदकिस्मती से, अपनों की ही गद्दारी की वजह से नरसिम्हा रेड्डी की कोशिशें नाकाम होने लगीं। उनके कुछ करीबियों ने अंग्रेजों को उनकी जानकारी दे दी। और इसी भीतरघात की वजह से वे अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ लिए गए। पकड़े जाने के बाद भी नरसिम्हा रेड्डी झुके नहीं। अंग्रेजों ने उन्हें मौत की सजा दी, लेकिन वे उनके हौसले को नहीं तोड़ पाए। नरसिम्हा रेड्डी की यह लड़ाई अपने समय की सबसे लंबी चलने वाली लड़ाइयों में से एक थी। भले ही वह युद्ध जीत न पाए, लेकिन उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के मन में आजादी की लौ जला दी। आज भी उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाता है, जिसने अकेले दम पर एक बहुत बड़े और क्रूर सिस्टम को चुनौती दी थी।
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